पर्वतीय किसानों की दयनीय हालत

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आजकल कर्ज माफी को लेकर देश के कई राज्यों में किसान आंदोलन कर रहे हैं और खेती बाड़ी को छोड़कर शहरों में धरना दिए हुए हैं। पिछले कुछ दिनों में कई किसानों ने अपने जीवन से हाथ धो लिया है और ये सिलसिला अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। अनुमान यही है कि रुक भी नही सकता क्योंकी सरकार इसे क़र्ज़ माफ़ी के नजरिये से देख रही है जबकी मामला और असल सत्य यह है कि किसानों को कड़ी मेहनत और अच्छे उत्पादन के बावजूद उचित मुल्य नही मिल पाता है।

आपको बता दें कि मध्यप्रदेश में लगभग दस से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं और ये सिलसिला अब भी ज़ारी है। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और पंजाब के किसानों का आंदोलन दरअसल सारे देश के किसानों का आंदोलन है। जिसकी तरफ हमारी लोकतांत्रिक सरकार को जल्द से जल्द ध्यान देने की आवश्यकता हैं।

उत्तरप्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड हिंदुस्तान के मानचित्र पर उभरने वाले इस राज्य के किसानों का भी हाल अन्य किसानों की ही तरह हैं। ज़िला नैनीताल के अंतर्गत आने वाले भीमताल निर्वाचन क्षेत्र का इलाका जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, फल पट्टी और सब्जियों की पैदावार के लिए प्रसिद्ध हैं। दिल्ली से केवल 315 किलोमीटर की दूरी पर एक पर्यटन स्थल के लिए प्रसिद्ध हैं। उस क्षेत्र के लोगों की आय का माध्यम खेती-बाड़ी ही है। कुछ दशक पहले इस क्षेत्र में आलू और सेब का अधिक उत्पादन हुआ करता था , लोग नौकरी की बजाय खेती–बाड़ी करना पसंद करते थे। लेकिन समय के साथ स्थिति बदल गई।

उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद इस स्थिति में और भी तेज़ी से परिवर्तन आए हैं। आज यहाँ के किसान खेती–बाड़ी छोड़ कर अपनी ज़मीने बेच रहे हैं। इसका असली कारण उत्पादन का सही मुल्य न मिल पाना और ब्याज खोरी है। एक तरफ जहाँ बाजारमें 100 ग्राम आलू 40 रूपये का बिक रहा है, इस हिसाब से 1 किलोग्राम आलू 400 रूपये का हुआ।

आप हैरान न हों, मेरी बात पर यकीन न हो रहा हो तो एक आलू की चिप्स का पैकेट खरीद कर देख लें 50 ग्राम पैक में 10ग्राम अतिरिक्त डाल कर कुलवजन 60 ग्राम का पैक 20 रूपये में आप को बेचा जाता है अब आप खुद ही हिसाब लगा लें ।

सरकार किसान के लिए सस्ते कर्ज की व्यवस्था तो कर देती है किन्तु उनकी फसल के लिए बाजारों की तरफ कोई ध्यान नहीं देती। जिसके परिणामस्वरूप किसान को उतना मूल्य भी नहीं मिल पाता कि कर्ज ली गयी राशि को वसूल कर सके। राज्य के गठन के बाद से ही नैनीताल ज़िले के पर्वतीय निर्वाचन क्षेत्र भीमताल के फल एवं सब्जियों की खेती–बाड़ी करने वाले हजारों किसानों की मांग रही है कि, उनके उत्पादों का कम से कम समर्थन मूल्य तय कर दिया जाए।

इस मुद्दे को लेकर स्थानीय प्रतिनिधियों ने अपनी खूब राजनीति चमकाई और जब जीत हासिल हो गयी तो खासमुद्दे को ही भूल गये। हल्द्वानी में मंडी तो बनवा दी गयी लेकिन मंडी की सारी दुकानेंबनीयों को दे दी गयी। किसान अपनी फसल को बिना दलाल के बेच नहीं सकता।

दरअसल पूरा खेल ब्याज खोरी का है ,किसान आढ़तियों के माध्यम से अपनी फसल को बेचते हैं। जिसमें कमीशन के तौर पर 2 से 5 प्रतिशत चुकाना होता है, इन आढ़तियों द्वारा किसान की फसल को बेचने के बाद कमीशन काट लिया जाता है। चाहे किसान की फसल को9 में बेचे या 100 में लेकिन इनका कमीशन पक्का है। इन आढ़तियों और पहाड़ी किसानों का रिश्ता काफी पुराना या यूं कहें कि पीढ़ियों से चला आ रहा है। ये जरूरत के समय किसानों के बड़े मददगार साबित होते हैं।

स्थानिय किसान खुश राम सिंह के मुताबिक “बेटी की शादी करनी हो या ठण्ड का राशन लाना हो। लाला जी को एक चिट्ठी लिखने की देर है “लालाजी राम- राम बेटी की शादी के लिए 100000 रुपयों की आवश्यक्ता है। साथ ही 4 बोरा आटा, 2 बोरा चावल, 5 टीन तेल, 10 भेली गुड़ भेजदेना। पैसा कुछ समय बाद भेजूँगा। इसी चिट्ठी को मेरा निमंत्रण समझकर बच्ची की शादी में जरूर आना – आपका राम सिंह।” लाला भी बिना देर किए अधिकतर सामान खुशी -खुशी दूसरे ही दिन भिजवा देता है। पैसे की कोई चिंता नहीं क्योंकि फसल तो किसान ने उसी की मंडी में भेजनी है।

वह अधिक सामान और पैसे तो भेजता ही है साथ ही 2000 का नोट भी निमंत्रण पत्र के बदले भिजवा देता हैं किसान भी खुश क्योंकि उसकी बेटी की शादी में सबसे ज्यादा पैसा  लिखवाने वाले लाला जी ही तो एक मात्र व्यक्ति हैं । किसान को लाला जो सामान भेजता है, उसकी मुल्य पर किसान से 1 से लेकर 5 प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज वसूलता है। ब्याज की यह दरें किसान की औकात देखकर तय की जाती हैं। औकात को जांचने के लिए सालभर में किसान द्वारा भेजीजाने वाली फसलऔर किसान के लाला से सबंध हैं ’’।

एक अन्य स्थानीय किसान उपयुक्त बातों का समर्थन करते हुए कहते है की“ इस प्रथा ने वास्तव में किसान को एक लत लगा दी है, की वह खुद को आत्मनिर्भर नहीं बना पा रहा है । अपने उत्पाद को मंडी में बेचने और ग्रेडिंग करने की जानकारी न होने के कारण किसान अपने उत्पाद को वह कीमत नहीं दिला पाता जो वास्तव में इसे मिलनी चाहिए। हम अपने उत्पादन को उचित मूल्य न मिलने के कारण पेड़ों में ही गलने को छोड़ देते है, क्योंकि अगर वह उसे मंडी भेजता है तो फलों की कीमत तो मिलनी नहीं है, किराया अलग से बोझ बनेगा।

खेती करने वाले किसान महेश गलिया जी कहते हैं “प्रति व्यक्ति फल की आवश्यकता 140 ग्राम होती है जबकि एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति औसत उपलब्धता केवल  80 ग्राम आकी गयी है।यही वज़ह है की फल फ्रूट आम आदमी की पहुँच से बाहर है। उचित मूल्य न मिलने पर किसान अपने फलों को पेड़ो की जड़ो में ही सड़ा कर खाद के रूप में प्रयोग करने पर मजबूर हैं। यह किसानों की वास्तविक पीड़ा है। किसान मेहनत करके अपने फलों को मंडी पहुंचाकर आढ़तियों के हाथ कर देता है वह किसान की फसलों को कितने में बेच रहा है? और किसान को कितना बता रहा है? यह केवल विश्वास पर निर्भर है”।

इसी कारण आज पहाड़ी किसानों की हालत बहुत खराब हो गई है। लगातार हो रहे मौसम परिवर्तन के कारण भी फसल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है और किसान सरकारी क़र्ज़ केसाथ ही ब्याज के बोझ तले दबता जा रहा है। हालात ये है कि,फलपट्टी और आलू उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माने जाने वाले गाँवो गागर, रामगढ़, शीतला, सतखोल, मौना, मुक्तेश्वर, सतबुंगा, सूपी,सुनकिया, लोद,  गल्ला, कसियालेख, बना, चौखुटा, गजार, परबड़ा, शशबनी, सुंदरखाल, धनाचूली आदि गाँवों में किसानों नेअपनी जमीनों को बेचना शुरू कर दिया है। बिल्डरों द्वारा इन जमीनों को बंजर घोषित करवा कर बड़े- बड़े होटलों, कोठियों का निर्माण कराया जा रहा है।

गजार गाँव के एक बुजर्ग किसान प्रताप सिंह कहते हैं कि“ यहक्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और ठण्डी जलवायु के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसको देखते हुए शहर के लोग यहाँ पर जमीनें खरीदना पसन्द करते हैं। खेती अब होती नहीं लोग कुछ पैसों के लालच में अपने पुरखों की जमीनों को बेच रहे हैं, आने वाले भविष्य में यहाँ के निवासियों का क्या होगा भगवान ही मालिक है!”

अगर इसी तरह  सरकार किसानों की समस्याओं को अनदेखा करती रही तो वह दिन दूर नहीं जब, इस क्षेत्र के किसान अपनी खेती की जमीनों को बिल्डरों के हाथों बेच देगें। इसलिए आवश्यकता है कि समय रहते किसानों की कड़ी मेहनत का भरपूर फल दिया जाए ताकि इनके उगाये फलों का स्वाद भारतवासियों को मिल सके |

पंकज सिंह बिष्ट
नैनीताल (उत्तराखंड)

 

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