शाहिद आज़मी जैसे लोगों की आज क़ौम को ज़रूरत है

    0
    3791

    फ़रहाना रियाज़ 

    11 फ़रवरी 2010 को भुलाना बहुत मुश्किल है जी हाँ यही वह तारीख़ है जब मुंबई के मशहूर एडवोकेट शाहिद आज़मी को उनके आफ़िस में सिर्फ़ 32 साल की उम्र में क़त्ल कर दिया गया था।मज़लूमों की लड़ाई लड़ने वाले,  आतंकवाद के झूठे इल्ज़ाम में फंसे नौजवानों की पैरवी करने वाले बेख़ौफ़ एडवोकेट शाहिद आज़मी अपनी दलीलों और सुबूतों से अदालत को क़ायल कर लेते थे|

    1994 में शाहिद को भारत के कुछ  लीडर्स की हत्या की ‘साज़िश’ के आरोप में पुलिस ने उनके घर से गिरफ़्तार किया था । उनको एक ऐसी साज़िश के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था जो उन्होंने किया ही नहीं था । फिर भी उनको सात साल की सज़ा हुई।

    दिल्ली के तिहाड़ जेल में रहते हुए शाहिद ने ग्रेजुएशन  किया । 2001 में जब वे रिहा हुए तो घर आए और  कानून की पढ़ाई पढ़ी और कानून की डिग्री हासिल की। जिसके बाद उन्होंने वक़ील मजीद मेनन के साथ बतौर जूनियर 2,000 रुपये महीने पर काम शुरू किया । बाद में, उन्होंने अपनी ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी। शाहिद आज़मी ने आतंकवाद के झूठे इल्ज़ाम में फंसे नौजवानों की पैरवी के अलावा हमेशा मज़लूमों के केसेज़ की ही पैरवी की ।

    उनका दावा था कि एजेंसियां खुद दहशतगर्दों को पैदा करती हैं। एक मंसूबे के तहत दहशतगर्दों बनाये जाते हैं।
    उन्होंने अपनी एक तक़रीर में कहा था कि एक नौजवान को मुम्ब्रा से गिरफ़्तार किया गया उस पर इल्ज़ाम था कि वह जैसे ही पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आया पुलिस उसके घर पहुंची और उसको गिरफ़्तार किया गया। उससे पूछताछ हुई कि तुझे पाकिस्तान किसने भेजा? तभी उसे एक कॉल आयी पुलिस ने मालूम कि किसका कॉल है?  नौजवान ने बताया कि ये कॉल उस आदमी का है जिसने मुझे ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजा। पुलिस ने कहा कि उसे यहाँ बुलाओ उसे नहीं बताना कि हम यहाँ मौजूद हैं। जब वह आया उसे गिरफ्तार किया गया गिरफ़्तार करने वाले सीनियर इंस्पेक्टर को वह आदमी कहता है कि मुझे हाथ मत लगाना मैं फलां फलां कमिश्नर का आदमी हूँ| पुलिस ऑफिसर उसी वक़्त कमिश्नर को फोन लगाता है और इस बात का इत्मीनान करता है कि ये आदमी जिसने एक मासूम लड़के को ट्रेनिंग के लिए भेजा वह कमिश्नर का आदमी है उस को छोड़ दिया लेकिन नौजवान गिरफ़्तार कर लिया वह नौजवान 3 साल जेल में रहा ।

    उनका कहना  था कि वह असल दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ हैं लेकिन जिन लोगों को दहशतगर्दों के झूठे इल्ज़ाम में फंसाया जाता है वह उनकी पैरवी करते हैं। बतौर वकील अपने 7  साल के कैरियर में शाहिद ने आतंक के आरोप में फंसे 17 बेगुनाहों  को रिहा करवाया।  उन्होंने हर बार अदालत में यह साबित किया कि इन लोगों को सिस्टम में बैठे कुछ लोग अपनी नाकामी छुपाने के लिए फंसा रहे हैं। शाहिद के विरोधियो को ये बात पसंद नहीं आई।

    आतंक के इलज़ाम में बंद लोगों के केस छोड़ने  के लिए शाहिद को धमकियां मिलने लगीं।  एडवोकेट शाहिद  ने किसी की नहीं सुनी, जिसके नतीजे में धमकी देने वालों ने उनके ऑफिस में उनको गोलियों से शहीद कर दिया।

    एडवोकेट शाहिद की शहादत को आठ साल हो गये हैं लेकिन अभी तक उनको इंसाफ़ नहीं मिला है ।उनके छोटे भाई खालिद जो ख़ुद भी एक एडवोकेट हैं, का कहना है कि इस घटना को आठ साल हो गये हैं लेकिन एक दिन ऐसा नहीं गुज़रता है जब हम उसे याद नहीं करते हैं। हम शुक्रगुज़ार हैं कि सिर्फ़ हम ही नहीं बल्कि पूरे देश में उनकी याद में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    उनकी 62 वर्षीय माँ  रेहाना ने अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है। उनका कहना है कि मेरा अल्लाह पर यक़ीन है हमें इंसाफ़ ज़रूर मिलेगा । उन्होंने कहा कि हर घर में शाहिद जैसा बेटा ज़रूर होना चाहिए। जिस दिन उनका क़त्ल हुआ उस दिन भी उनके पास मदद के लिए फोन आया था और वो मदद के लिए फ़ौरन ऑफिस भी गये। लेकिन नहीं मालूम था कि मदद करने वाले ही उन्हें क़त्ल कर देंगे । उन्होंने मेरे बेटे का नहीं बल्कि इंसानियत का क़त्ल किया है ।

    एडवोकेट शाहिद हम सबको छोड़ कर चले गए लेकिन हमें एक राह दिखा गए । शाहिद  हमे सिखा गए कि कैसे भी हालात हो जाए, कितने भी ज़ुल्म हो जाए तैश में आकर फैसला लेने की बजाये उस रास्ते पर चला जाए जो कानून हमें देता है। शाहिद आज़मी जैसे लोगों की आज क़ौम को ज़रूरत है और उनकी ज़िंदगी नौजवानों के लिये मिसाल है….

     

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here