शहीद नगरी बेवर में शहीद मेला – हम लड़ेंगे जिन्दगी के वास्ते अंधेरो से

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शहीद

सुनील दत्ता 

मैनपुरी, उत्तर प्रदेश:

कभी मुठ्ठियों की हरकत से
घर – घर नया उजाला होगा
फिर बारी आई है
बुझी मशाल जलाने की
हम लड़ेंगे
जिन्दगी के वास्ते
अंधेरो से
रौशनी के वास्ते

इसी रौशनी के वास्ते शहीद नगरी बेवर में विगत पैतालीस वर्षो से शहीद मेला का आयोजन उन महान क्रांतिवीर शहीदों को हमेशा दिल में संजोये रखने के लिए प्रति वर्ष नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन 23 जनवरी से शुरू होता है। हम आपको बताते चले कि यह क्रान्ति मेला की शुरुआत 1972 में कामरेड जगदीश नरायण त्रिपाठी ने एक दिवसीय मेले के रूप में इसका सूत्रपात किया था। आज यह मेला उनके भतीजे राज त्रिपाठी के नेतृत्त्व में 20 दिन का मेला हो गया है।

23 जनवरी 2017 को इस शहीद मेला का उद्घाटन करने क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर – संदीप थापर, साथ ही शहीदे ए वतन अशफाक उल्ला खा के पौत्र अशफाक उल्ला ने मशाल जलाकर विधिवत उदघाटन किया ।
क्रांतिवीर अशफाक उल्ला खां के पौत्र ने जनमानस को सम्बोधित करते हुए कहा कि शहीदों की मूर्ति लगाने से कुछ नही होगा, बल्कि उनको हमे रिश्तो से जोड़ने की जरूरत है। जब हम उन्हें रिश्तो से जोड़ेगे तब वो हमारे दिल के बहुत करीब होंगे ऐसे में हमेशा उनकी याद बनी रहेगी और वो प्रेरणा देते रहेगे।

क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर ने अपने सम्बोधन में कहा कि देश को आजादी के उजाले में लाने वाले शहीदों की शहादत की तुलना करना ठीक नही। ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आजादी के संघर्ष में अपनी आहुति देने वाले वीर एक समान है उनका सम्मान एक जैसा होना चाहिए।

सुखदेव के दुसरे भतीजे संदीप थापर ने कहा कि यह दुनिया शहीदों को जातीय खांचे में ना बाटे। क्रांतिवीरो की कोई जाति नही होती है बस उनका एक धर्म था देश को अंग्रेजो से मुक्ति दिलाकर आम हिनुस्तान के आम आदमी को आजादी दिलाना। इसी आजादी के लिए हमारे सारे पुरखो ने हँसते – हँसते फांसी के फंदों को चूम लिया। उन्होंने अपना वर्तमान हमारे भविष्य के लिए कुर्बान कर दिया। इस शहीद मेले से सरकार को एक अपील की गयी कि क्रांतिवीर सुखदेव की प्रतिमा संसद भवन में लगे ।

शिवचरण लाल शर्मा के पुत्र सरल कुमार शर्मा ने कहा कि देश की जंग ए आज़ादी के नायकों को सरकार ने कभी वह सम्मान नहीं दिया जिसके वो हकदार थे। उन्होंने आगे कहा कि पुरे भारत में शहीदों की कुर्बानियों पर कही भी इस तरह के मेले का आयोजन नही होता है।

मेले को सुचारू रूप से गति प्रदान करने वाले शहीद जमुना प्रसाद त्रिपाठी के पौत्र और मेला प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने कहा कि हमारे पूर्वज कामरेड जगदीश नरायन त्रिपाठी ने इस मेले की परम्परा की नीव डाली थी अब यह पौधा बनकर खिल रहा है, इसे वट वृक्ष का स्वरूप हम नौजवान देंगे। उन्होंने आगे बताया कि मेले का उद्देश्य सिर्फ मेला लगाना नही है। हमारा उद्देश्य है कि 1857 से निकली चिंगारी, जिसमें हमारे पुरखो ने देश की आजादी के लिए अपनी आहुति दी है, उन पुरखो को आगे के समय में आने वाली पीढ़ी से अवगत करना है कि किस जज्बे और हौसले से हमे आजादी मिली है जिसके कारण हम इस आजाद मुल्क में अपनी बात को कह सकते है और आजादी में सांस लेते है।

शहीद मेला करीब 19 दिन चलता है इस मेले की ख़ास बात यह है कि शहीद मंच से विभिन्न भिन्न कार्यक्रमों की प्रस्तुती दी जाती है।

24 – 25 जनवरी को समाज में जागरूकता लाने के लिए सांस्कृतिक माध्यमो से सन्देश दिया गया।

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर बेवर नगर के सदर चौराहे से साझी विरासत के तहत झंडा रोहन के बाद हजारो की संख्या में जलूस में परिवर्तित होकर लोग शहीद क्रान्ति मंदिर गए और समाधि स्थल पर माल्यापर्ण किया। यह जलूस शहीद मेला स्थल पर राजा तेज सिंह के किला में लगे क्रांतिवीरो शहीदों की प्रदर्शनी स्थल पर समाप्त हुआ।

दिनाक 27 जनवरी को सिविल पेंशनर जिला सम्मेलन के माध्यम से जानकारी दी गयी।

28 जनवरी को नारी शक्ति महिला सम्मेलन व शुशी प्रदर्शनी के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी कि आज की नारी अबला नही है आज नारी सबल हो गयी है।

29 जनवरी को धर्मदृष्टि परिवार की ओर से ‘’ कलम उनकी जय बोल ‘’ के माध्यम से समाज में फैले भ्रांतियों के साथ अंध विश्वास पर जबर्दस्त प्रहार किया गया।

30 जनवरी को बेवर नगर के सुभाष चौक से शहीदों की याद में शहीद राज कलश यात्रा के माध्यम से उन सारे शहीदों को श्रद्दांजली अर्पित किया गया ।

31 जनवरी विधिक साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से अवाम को विधिक जानकारी दी गयी ।

1 फरवरी को साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला गया ।

2 फरवरी स्वतंत्रता सेनानी सम्मेलन के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी व्यथा को व्यक्ति किया। इस अवसर पर अमर शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद के भतीजे सुजीत आज़ाद व् पौत्र अमित आज़ाद ने कहा कि आज के इस दौर में शहीदों के व्यक्तित्व और कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचित कराता और उनकी स्मृतियों को संजोता ये शहीद मेला पूरे देश के लिए एक मिसाल है।

शहीद मेला का मुख्य आकर्षण रहा राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, जिसमें सन्देश को आगे बढ़ाते हुए संदेश चौहान ने पढ़ा, हमने विरोध जुल्म का किया, जाति का नही इतिहासों से पूछो यदि हो संदेह कही। आलोक भदौरिया ने पढ़ा, कई घर बार जलते है , कई लाशें भी गिरती है इसी कीमत पे मिलता है नये सरदार का चेहरा।

मेले के समापन के अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काकोरी काण्ड के क्रांतिवीर रामकृष्ण खत्री के पुत्र उदय खत्री ने कहा कि आजादी के जंग में जिन पुरोधाओं के बल पर आज हम लोग आजादी की सांस ले रहे है मैं उन अनाम व नाम क्रांतिवीरो को इस मंच से नमन करता हूँ। उन्होंने शलभ श्रीराम की पंक्तियां पढ़ी. ‘हिन्दोस्तां की शान है अशफाक व बिस्मिल ,दो जिस्म है इकजान है अशफाक व बिस्मिल , इस देश के दो लाडलो के नाम से ज़िंदा ,दो सूरते – ईमान है अशफाक व बिस्मिल’।

समापन समारोह की अध्यक्षता कार्न्तिवीर पंडित गेंदा लाल दीक्षित के प्रपौत्र मधुसुदन दीक्षित ने की। उन्होंने कहा कि मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ ऐसा शहीद मेला पुरे भारत के किसी अंचल में नही लगता है। धनी है बेवर की धरती जहा 15 अगस्त 1942 में ही विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने थाने पर तिरंगा लहरा दिया।

समापन समारोह में मेला सह-सयोजक इन्द्रपाल सिंह यादव , हाजी इदरीश अली , भगवान दास मिश्रा श्याम स्नेही श्याम त्रिपाठी रमेश गुप्ता गगन भारत , बिपिन चतुर्वेदी , डा रामधन राठौर उमेश राठौर , अजय सिंह भास्कर ने अपने विचार व्यक्त किये। जी एस एम् विद्यालय के बच्चो द्वारा समर्पित अनेकता में एकता के माध्यम से शहीद मेला के समापन को यादगार बना दिया ।

समापन के अंत में शहीद मेला के प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा, ’ नही सदा इतिहास सिर्फ शमशीर लिखा करती है, नही वक्त के साथ सदा तकदीर चला करती है’।

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