वन्दे मातरम् को नहीं दिया जा सकता राष्ट्रियगान जैसा दर्जा: सुप्रीम कोर्ट

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वन्दे मातरम्

सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक पीठ ने शुक्रवार को वन्दे मातरम् गीत को राष्ट्रिय गान जन गण मन जैसा दर्जा देने की मांग को नामंज़ूर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला भारतीय जनता पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका को नकारते हुए सुनाया।

भारतीय जनता पार्टी नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल कर यह मांग की थी कि राष्ट्रिय गान और राष्ट्रिय गीत को समान दर्जा दिया जाए। उनकी तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि यह याचिका 2016 की रिट याचिका न। 855 जैसी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हाल में राष्ट्रीय गान को गाना अनिवार्य किया था।

उन्होंने मांग की थी कि संविधान के अनुच्छेद 51A के तहत राष्ट्रिय गान, राष्ट्रिय ध्वज और राष्ट्रिय गीत को प्रोमोट करने के लिए एक राष्ट्रिय पालिसी बनायी जाए।

जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर भानुमती और जस्टिस मोहन एम शंतागौदार ने भाजपा नेता की याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद नंबर 51A राष्ट्रिय गीत की तरफ इशारा नहीं करता है। इस अनुच्छेद में सिर्फ राष्ट्रिय ध्वज और राष्ट्रिय गान का ज़िक्र है।

‘इसलिए, हम राष्ट्रिय गीत से सम्बंधित किसी वाद-विवाद में नहीं घुसना चाहते हैं,’ पीठ ने कहा।

ज्ञात रहे कि ‘ वन्दे मातरम् ’ गीत के ऊपर अक्सर विवाद रहता है। कुछ धार्मिक संगठन काफी समय से ‘ वन्दे मातरम् ’ गाने का विरोध कर रहे हैं। खास तौर पर इस्लाम धर्म के अनुयायी, जो एकेश्वरवाद में आस्था रखते हैं, वे इसे अपनी धार्मिक आस्था के खिलाफ मानते हैं।

इससे पहले बीते हफ्ते, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि सिनेमा घरों में फिल्म के बीच अगर राष्ट्रिय गान बजता है तब दर्शकों को खड़ा होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि फिल्म से पहले बजने वाले राष्ट्रीय गान को दर्शकों को गाने की भी ज़रूरत नहीं है।

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