मातृत्व स्वास्थ्य, लक्ष्य और चुनौतियां

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सांकेतिक तस्वीर

उपासना, बिहार

न्यूयार्क में 24 सितम्बर 2015 को 193 देशों के नेताओं की बैठक हुई जिसे यू. एन. सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट कहा गया।
समिट में 2030 तक के लिए एजेंडा तय किया गया ।

‘सस्टेनेबलडेवलपमेंट गोल (सतत विकास लक्ष्य) में 17 मुख्य विकास लक्ष्यों तथा 169 सहायक लक्ष्यों को निर्धारित किया गया है।

जो P5 (People, Planet, Peace,
Prosperous और Partnership परजोर देता है, इसे ग्लोबल गोल भी कहा जाता है।

इसे “हमारी दुनिया का रूपांतरण : सतत विकास के लिए 2030 का एजेंडा” (Transforming Our World : The 2030 Agenda for Sustainable Development) नाम दिया गया है।

जिसका आधार सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य(Millinum Development Goal)  है और इसकी समयसीमा 2015-30 तक है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के 17 गोल में से गोल 3का उद्देश्य सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देना और  मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाना प्रमुख लक्ष्य हैं। ‎

दुनिया के परिदृश्य में मातृत्व स्वास्थ्य

वर्तमान में पूरी दुनिया के परिदृश्य में मातृत्व स्वास्थ्य की स्थिति को देखें तो मातृ मृत्यु ‎दर में 45 प्रतिशत की कमी आई है। साऊथ एशिया में मातृ मृत्यु ‎दर 1990 से 2013 में 64 प्रतिशत कम हुआ है।

इसी दौरान सब सहारन अफ्रीकामें मातृ मृत्यु ‎दर 49 प्रतिशत कम हुआ है।

नार्थ अफ्रीका में गर्भवती महिला का प्रसव पूर्व जाँच (कम से कम 4 बार) जहाँ 1990 में 50 प्रतिशत था वो 2014 तक 89 प्रतिशत हुआ है।

गर्भनिरोधक का उपयोग पूरी दुनिया में बढ़ा है और 2014 में 64 प्रतिशत महिलायें इसका उपयोग कर रही हैं।

भारत में मातृत्व स्वास्थ्य

2015 में आई सयुंक्त राष्ट्र एजेंसी और वर्ल्ड बैंक की सांझा रिपोर्ट के अनुसार, देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से होने वाली गर्भवती महिलाओं की मृत्यु 1 लाख 36 हजार है।

रिपोर्ट के अनुसार देश में 20 प्रतिशत महिलाओं की मृत्यु खूनकी कमी से और 10 प्रतिशत मौतें गर्भपात से सम्बंधित जटिलताओं के कारण होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आकंड़ों के अनुसार भारत में 1 घंटे में 5 महिलाओं की मौत हो जाती है
इसका सबसे बड़ा कारण प्रसव के बाद रक्तस्राव और इस पर नियत्रंण न होना है।

ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट, 2017

(जीएनआर) की रिपोर्ट के अनुसार एनीमिया से जूझ रही महिलाओं की लिस्ट में भारत सबसे ऊपर है।प्रजनन उम्र में पहुंचने वाली महिलाओं में से आधी से ज्यादा महिलाओं में (51 प्रतिशत) खून की कमी(एनीमिया) है। ऐसी महिलाएं जब गर्भवती होती हैं, तब जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरनाक होता है।

वही प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के रुडो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के शोधकर्ताओं ने
अपने अध्ययन में पाया कि भारतीय महिलाएं जब गर्भवती होती हैं।

उनमें से 40 फीसदी से अधिक गर्भवती महिलाऐं सामान्य सेकम वजन (औसतन7 कि.ग्रा.) की होती हैं,
जो गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ- साथ मां के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा होता है।

इसी प्रकार यूनिसेफ की रिर्पोट ‘एंडिंग चाइल्ड मैरिज     प्रोग्रेस एंड प्रोस्पेक्ट 2014’ के अनुसार दुनिया की हर तीसरी बालिका वधू भारत में है।

बाल विवाह के कारण बच्चियां कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं जिससे उनकी मृत्यु, गर्भपात मेंवृद्धि, कुपोषित बच्चों का जन्म,

माता में कुपोषण, खून की कमी होना, शिशु मृत्यु दर, माता में प्रजनन मार्ग संक्रमण यौन संचारित बीमारिया बढ़ती हैं।

स्वास्थ सुविधाओं की कमी

देश में शहरों की तुलना में गावों में स्वास्थ सुविधाएं अच्छी नही है।  2011 के ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों को देखें तो गावों में 88 फीसदी विशेषज्ञ डाक्टरों तथा 53 फीसदी नर्सों की कमी है। शहरों में 6 डाक्टर प्रति दस हजार जनसंख्यामें हैं वही ग्रामीण में यह 3 डाक्टर प्रति दस हजार जनसंख्या में है।

संस्थागत डिलेवरी की स्थिति देखें तो एन.एफ.एच.एस.-4 के अनुसार 78.9 गर्भवती महिलाओं की संस्थागत डिलेवरी हुई है।

केंद्र और राज्य द्वारा किये जा रहे प्रयास

सरकार द्वारा मातृत्व स्वास्थ्य की निम्नतम स्थिति को लेकर कई तरह के प्रयास किये जा रहे हैं।राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत पिछड़े राज्यों और ग्रामीण इलाकों में बच्चों व महिलाओं में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने परजोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना, जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम आदि चलाये जा रहे है।

15 फरवरी,2017 को भारत सरकार ने अगले पांच वर्षों में स्वास्थ्य सुविधाओं में

गर्भवती महिलाओंऔर नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को आधा करने का लक्ष्य रखा है।

असफलता के कारण

सरकारी प्रयासों के बावजूद मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चिंताजनक है, इसके लिए सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर-स्टाफ की कमी, सुविधाओं की अनुपलब्धता, संसाधनों की कमी, अस्पतालों में काम करने का ढर्रा, कर्मचारियों काखराब व्यवहार, लोगों में जागरूकता की कमी प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।

परंतु सबसे अधिक ज़िम्मेदार है हमारा समाज और महिलाओं के प्रति रुढ़ीवादी मानसिकता, ऐसे में आवश्यक है कि महिलाओं को केवल बच्चा पैदा करने वाला माध्यम ना समझा जाये। जीवन भर अगर एक परिवार महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहे तो निश्चित ही आने वाला बच्चा और मां दोनो स्वस्थ रहेगें परंतु विज्ञान और शिक्षा के इस युग में भी महिलाओं और उनकी गर्भावस्था के प्रति लोगो के रवैये में कुछ खास बदलाव नही आया है परिणामस्वरुप मां बनने के क्रम मे या तो मां को जीवन त्यागना पड़ता है या होने वाले बच्चे को।

आईए आज से और अभी से मातृत्व स्वास्थ्य को लेकर सचेत हो जाएं, देश में आधी आबादी का दर्जा रखने वाली महिलाओं की महत्वपूर्णता को समझें। इसको लेकर जो योजनायें और कानून है उनका प्रचार प्रसार करें।   इसके लिएस्कूलों/कालेजों/ के प्रशिक्षण में लैंगिक समानता, महिला अधिकार,कानून,योजनाओं की दी जाने वाली जानकारी भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

सतत विकास लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश में लैंगिक समानता होगी, महिलाओं को दोयम दर्जे का नहीं माना जाएगा और महिलाओं को अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार व संसाधनों तक पहुँच होगी।

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