पूर्वोत्तर के मज़दूरों की ज़िंदगी मंदिर-मस्जिद के झगड़ों के बराबर टीआरपी नहीं दिला सकती

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मज़दूरों

वाहिदा परवेज़ , असम

मेघालय की पूर्वी जयंतिया पहाड़ियों के इलाके में 13 दिसंबर को कोयला खनन के दौरान फंसे 15 मजदूरों के अब जीवित रहने की उमीद ख़त्म हो चुकी है। लम्बे समय की तलाश के बाद 24 जनवरी एक लाश की बरामदगी के बाद यह बात और पुख्ता हो जाती है। 

मेघालय की कोयला खदान में होने वाली यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले या ये कह सकते है कि आज तक हज़ारो लोगों ने यहाँ कोयला खदानों में अपनी जान गँवायी है। इनमें ज्यादातर प्रवासी मज़दूर है जिन्हें कोयला माफिया झूठी आस दिला कर ले जाते है। जिस तरह कभी चाय बागन के लिए मध्य भारत से लोगों को हांक कर ले जाया गया था लेकिन वहां जाकर आधे से ज़्यादा लोगों को बीमारी के कारण जान गवानी पड़ी और जो बच गए उन्हें दासों वाली ज़िंदगी जीनी पड़ी। उसी तरह कोयला खदान के लिए मजदूरों को दूसरे राज्यों से लालच दे कर ले जाया जाता है और वहाँ जाने के बाद उन्हें पता चलता है कि ये काम कितना मुश्किल और जानलेवा भी है। वहाँ असम, बांग्लादेश और नेपाल से मजदूर काम की तलाश में आते है। ग़रीबी और आशिक्षा के कारण ये काम करना उनकी मजबूरी है। 

2014 में एनजीटी  द्वारा मेघालय में कोयला खनन को बैन कर दिया गया था। इसमें बच्चों द्वारा काम कराया जाता है जिसमें किसी तरह की कोई सुरक्षा नहीं होती है। प्रसाशन के  निरिक्षण की कमी, निर्वनीकरण और प्रदुषण आदि समस्याओं को और साथ ही इस तरह के हादसों को देखते हुए कोयला खनन में बैन लगाया गया था। लेकिन उसके बाद भी अवैध रूप से खनन चलता रहा और इस तरह के हादसे भी होते रहे हैं।

इस काम में एक छोटी सी सुरंग बनायी जाती है जिससे गुज़र कर उन्हें कोयला खोद कर लाना होता है। इसमें ज्यादातर बच्चे काम करते हैं क्योंकि उनके लिए अन्दर जाना आसान होता है।लेकिन यह बेहद जानलेवा है। इन सुरंगों में कोई सुरक्षा उपकरण नहीं होते और अंदर ज़हरीली गैस भी मौजूद होती है। यहाँ अक्सर इसी तरह की खदानों में फंस कर मजदूरों की मौत होती है। 2012 में दक्षिण गारो पहाड़ियों में 15 लोगों की इसी तरह कोयला खनन के दौरान अन्दर फंस कर मौत हो गयी थी। उस समय भी फंसे हुए लोगों के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया था।

दया खरसाती जो नार्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी की शोध छात्रा और मेघालय की मूल निवासी भी है का कहना है कि- “यहाँ पर यह पहली बार नहीं हो रहा है। पिछली बार मई 2018 में 30 लोग ऐसे ही फंस गए थे। जिनकी लाशे मिली तो थी लेकिन उन्हें चुप चाप उनके घर पहुँचाया गया था। इस बार यह बात इसलिए मीडिया तक पहुँची क्योंकि उन 15 लोगों में तीन यहाँ के लोकल लोग थे। वरना वहाँ पर ज्यादातर असम के लोग ही काम करते है।”

दरअसल पूर्वोत्तर में होने वाले इस तरह के ज़्यादातर हादसों का लोगों को पता भी नहीं चल पाता है। हम यह कह सकते है कि पूर्वोत्तर के प्रति भारत सरकार और मीडिया के हमेशा से रहने वाले अलगाव भाव के कारण ऐसा होता है। सरकार और ज़्यादातर राष्ट्रीय मीडिया वहाँ पर होने वाले हादसों पर ध्यान ही नहीं देते है। केंद्रीय सरकार की इस अनदेखी को लेकर पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों को हमेशा शिकायत रहती है। लेकिन उनकी इस शिकायत का आजतक कोई समाधान नहीं निकला है।

पूर्वोतर राज्यों और उनके निवासियों की इस तरह की अनदेखी सिर्फ़ सरकार तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह अनदेखी मुख्यधारा मीडिया की तरफ़ से भी है। इसका एक बड़ा उदाहरण जुलाई, 2018 में थाइलैंड में हुयी घटना का कवरेज है। भारतीय मुख्यधारा मीडिया ने उस घटना को लगातार कवरेज दिया था। लेकिन मौजूदा घटना में इसी मीडिया ने लचर भूमिका निभाई। 

मीडिया में आने वाली ख़बरों का असर प्रशासन पर भी पड़ता है। ऐसे में शायद अगर इस घटना को भी उतना कवरेज मिलता तब शायद प्रशासनिक अमला ज़्यादा मुस्तेदी से अपनी भूमिका निभाता। शायद बचाव कार्य के लिए ज़रूरी मशीने वक़्त से मुहैया हो पाती और खदान में फँसे मज़दूरों को जीवित बाहर निकाला जा सकता। लेकिन शायद पूर्वोत्तर के निवासियों और मज़दूरों की ज़िंदगी मंदिर मस्जिद के झगड़ों के बराबर टीआरपी नहीं दिला सकती।

वाहिदा परवेज़ मूलतः असम की निवासी हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लीया इसलामिया में शोधकर्ता हैं। वे पूर्वोतर राज्यों के हिन्दी साहित्य लेखन पर शोध कर रही हैं।  

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