पुरुषों के मुकाबले महिलाएं होती हैं अधिक सुरक्षित ड्राईवर

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सांकेतिक तस्वीर (स्रोत: autoguide.com)

डॉ नाज़िया नईम, 

इंक्रेडिबल आयुर्वेदा, भोपाल

“जज-जब तुम्हें पता था कि महिला कार चला रही है तो तुमने रोड के साइड में खड़े होकर जान बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”

फरियादी- कौनसा रोड हुज़ूर। मैं तो पार्क में सो रहा था।”

“उस समय मैं बेहोश होते होते बचा जब एक लड़की ने लेफ्ट इंडिकेटर दिया और लेफ्ट ही मुड़ी!”

महिलाओं की ड्राइविंग के बारे में ये और इन जैसे सैंकड़ों जोक्स आपने सुन रखे होंगे। महिलाएं बौखलाती हैं इन पर, पुरुष मज़ाक उड़ाते हैं। पर दोनों को ये सच मान लेना चाहिए कि पुरुष ‘बॉर्न ड्राइवर्स’ होते हैं पर महिलाएं सुरक्षित ड्राइवर्स। ये इनके दिमाग की सरंचना और लाखों वर्षों के जैविक विकास क्रम का परिणाम है।

दरअसल पुरुष का जैविक विकास एक शिकारी की तरह हुआ है। कुशल शिकारी बनने और जीवित रहने के लिए स्थानिक कौशल बहुत ज़रूरी होते थे। स्थानिक कौशल मतलब दिमाग में चीज़ों के आकार, आयाम, अनुपात, गतिविधि की त्रि-आयामी कल्पना, लक्ष्य की गतिविधि, रफ़्तार और फासले का अनुमान लगाना, बाधाओं को पार करना शामिल था। बड़े शिकारियों से जान बचाने और अपने शिकार को मारकर वापिस अपनी गुफा/घरौंदे में पहुंचने के लिए रास्ते और दिशाओं का ज्ञान, ऊंचाई, लम्बाई, चौड़ाई, गहराई का सटीक विश्लेषण ज़िंदा रहने को आवश्यक था। इसी कारण पुरुष अपने दिमाग में नक्शे को घुमाकर कहाँ और किस दिशा में जाना है, स्पष्टता से पता लगा लेते हैं और अपनी स्मरणशक्ति से रास्ते का ठीक ठीक अनुमान लगा लेते हैं। जबकि बन्द कमरे में अधिकांश महिलाएं नहीं बता पातीं कि उत्तर दिशा कहाँ है। रिवर्स पार्किंग करने और अपनी गाड़ी खोजने में महिलाओं को बहुत दिक्कत होती है। यूके में कार के मिरर व्यू में देखकर रिवर्स पार्किंग करने में पहली बार में पुरुषों की सटीकता 82% जबकि महिलाओं की 22% रही।

दरअसल टेस्टोस्टेरॉन लड़कों के दिमाग के बाएं हिस्से की वृद्धि को कम कर दाएं को अधिक विकसित करता है। जिससे लड़कों में दिशाएं, रास्ते याद रखने की क्षमता, निशाना लगाना, गणित, पज़ल सॉल्विंग में लड़के बेहतर होते हैं। उनकी यही विशेषताएं उन्हें कुशल ड्राइवर बनाती हैं।महिलाओं में दिमाग के दोनों भाग संतुलित रूप से विकसित होते हैं। इसीलिए महिलाएं मल्टीटास्कर होती हैं। चूंकि वे दिमाग के दोनों हिस्सों से काम लेती हैं इसलिए आमतौर पर दाएं-बाएं का अंतर स्पष्ट नहीं होता। मुझे याद है बचपन में नानी ने सिखाया था नाक में जिस तरफ लौंग पहनती हो उसी साइड रोड पर चलना। यह पापा के बताए रोड पर हमेशा बाईं तरफ चलना चाहिए की सलाह से ज़्यादा प्रभावी था।
पर क्या कारण है कि दुनिया भर के इंश्योरेंस कम्पनियों के आँकड़े बताते हैं कि महिलाओं की गाड़ी के क्लेम सबसे कम आते हैं, जो होते भी हैं वे छोटी मोटी ठुकाई, डेंट और खरोंचों के ही अधिकतर होते हैं जबकि पुरुषों के भयानक दुर्घटनाओं के। द टेलीग्राफ हो या टाइम्स ऑफ इंडिया के सर्वे, यही बताते हैं कि महिलाएं कोई भीषण एक्सीडेंट नहीं करतीं, उनके दुर्घटनाओं के शिकार होने का प्रतिशत भी कम है।

पुरुषों की सहजता और आक्रामकता इसका कारण हैं। ड्राइविंग पुरुषों के लिए इतनी सहज होती है कि वे अवचेतन मस्तिष्क/सबकॉंशियस माइंड से भी चलाते रह सकते हैं इसी कारण वे गाड़ी चलाते चलाते झपकी भी निकाल लेते हैं। इसी कारण कई पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल दुर्घटनाग्रस्त भी हुए हैं। जबकि ड्राइव करते समय महिलाओं का मस्तिष्क सजग और चौकन्ना रहता है। टेस्टोस्टेरॉन की अधिकता के कारण पुरुष अधिक आक्रामक होते हैं। ओवरटेकिंग, दूसरों से प्रतिस्पर्धा, रफ्तार और आगे निकलने की होड़ को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेने की प्रवृत्ति पुरुषों में अधिक पाई जाती है जो कि कई बार मेजर क्रेश का कारण बनती है।

महिलाओं में तुरन्त निर्णय लेने की क्षमता भी आमतौर पर कम होती है और दुविधा पर इसी कारण वे हड़बड़ी करने की बजाय इंतज़ार करना पसंद करती हैं जिससे दुर्घटना टाली जा सकती है। ड्राइविंग पुरुषों के लिए अपने माहौल के अनुसार अपनी स्थानिक क्षमता का परीक्षण होता है और महिलाओं का लक्ष्य एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक पहुंचना। अच्छी बात यह है कि लगातार अभ्यास से स्थानिक कौशल विकसित किये जा सकते हैं। महिलाएं भी लगातार अभ्यास से ड्राइविंग कौशल प्राप्त कर लेती हैं और करीब 18% महिलाएं पुरुषों के बराबर या बेहतर स्थानिक कौशल के साथ ही जन्म लेती हैं बाकी अभ्यास द्वारा निपुण हो सकती हैं।

वैसे ड्राइविंग स्कूलों द्वारा किये गए बहुत से सर्वे से ये बात पता चली है कि सुरक्षित ड्राइविंग के मामले में लिंग के साथ साथ उम्र का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। 40-55 वर्ष के शादीशुदा लोग कुशल और सुरक्षित ड्राइवर होते हैं और 18-25 वर्ष के अविवाहित खतरनाक हद तक जोखिम लेने वाले। कारण शायद स्पष्ट है।

(डॉ नाज़िया नईम इनक्रेडिबल आयुर्वेद क्लिनिक में कार्यरत हैं। इससे पहले वे गवर्नमेंट आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में मेडिकल ऑफिसर रह चुकी हैं। डॉ नाज़िया मध्य प्रदेश में हिजामा पद्धिति से इलाज करने वाले अग्रणी चिकित्सकों में शामिल है। डॉ नाज़िया द्वारा लिखित पैरेंटिंग पर एक किताब जल्द ही रिलीज़ होने वाली है।)

 

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