दम तोड़ती मौलाना आज़ाद फ़ेलोशिप: हजारों शोधकर्ता रोहित वेमुला बनने की राह पर

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मौलाना आज़ाद
एएमयू के छात्र occupy ugc आन्दोलन के दौरान साभार: twocircles.net

मोहम्मद फुरकान

सच्चर समिति की सिफारिशों के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘ मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप फॉर माइनॉरिटी स्टूडेंट्स’ की शुरुआत की थी। जिसके अंतर्गत पीएचडी में पंजीकृत ऐसे अल्पसंख्यक छात्र/छात्राएं जिनके अभिभावकों की वार्षिक आय 4.5 लाख से कम है, उन्हें जेआरऍफ़ के बराबर प्रति माह छात्र वृति दी जाती है। इसकी शुरुआत वर्ष 2009-2010 में हुयी थी। इसमें प्रति वर्ष 750 छात्र-छात्राओं का चयन मेरिट के आधार पर किया जाता है। इसकी फंडिंग अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय द्वारा की जाती है.

यूपीए द्वारा संचालित इस स्कीम ने अल्पसंख्यक ( मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन) छात्रों को पीएचडी की ओर बहुत ही आकर्षित किया है। साथ ही यह स्कीम अन्य स्कीमों के मुकाबले बहुत प्रभावी साबित हुयी। इसके परिणाम स्वरुप बहुत से लोग कामयाबी की बुलंदियों को छूने में कामयाब भी रहे।

2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद छात्रों में नया उत्साह जागा, सबका साथ सबका विकास जैसे नारों की वजह से छात्र अति उत्साहित थे। छात्रों को उम्मीद थी कि शायद नयी सरकार के आने से लाभार्थी छात्रों की संख्या को बढ़ाया जाता है। लेकिन परिणाम इसके उलट रहा। वक्त के साथ साथ छात्रों के खातों में फ़ेलोशिप आने में देरी होने लगी। जहाँ पिछली सरकार के दौरान फ़ेलोशिप हर माह के अंत में खातों में आ जाती थी, अब नयी सरकार के आने के बाद इसमें 2 से 3 महीने की देरी होने लगी। अंतत: नवम्बर 2015 से लेकर मई 2016 तक अल्पसंख्यक छात्रों को एक पैसा भी नहीं दिया गया। जबकि इसी स्कीम के समानांतर चल रही दूसरी स्कीम जो अनसुचित जाति व् जनजाति के लिए हैं वह बहुत अच्छी चलती रही।

अल्पसंख्यक छात्र प्रतिनिधिमंडल, जिसने 7 फरवरी 2017 को अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय में अधिकारीयों से मुलाक़ात की.

सात महीना बिना किसी सूचना के फ़ेलोशिप न मिलने पर छात्रों ने ऑनलाइन पोर्टल और सोशल मीडिया का सहारा लिया, लेकिन इस सब का कोई फायदा न हुआ। लेकिन छात्रों को कहीं से कोई भी उचित जवाब नहीं मिला। इसके बाद छात्रों ने पहले यूजीसी और फिर बाद में मई 2016 में अल्पसंख्यक मंत्रालय जाने का फैसला किया. वहां जाने के बाद छात्रों को ज्ञात हुआ कि फ़ेलोशिप की डिमांड के मुकाबले इसका फण्ड बेहद कम है।

छात्रों के आग्रह के बाद बकाया राशि प्राप्त तो हुई लेकिन इसका कोई स्थायी हल न निकल सका। स्कालरशिप बिना किसी निर्धारित समय के आती रही, लेकिन जल्द ही नवम्बर 2016 में बंद हो गयी। नए चयनित छात्रों को लगभग 10 महीने से एक भी पैसा नहीं मिला। जिसकी वजह से इन नए छात्रों में से कई छात्र पैसे की कमी की वजह से रिसर्च छोड़ने के मजबूर हो गए।

6 फरवरी 2017 को विभिन्न विश्वविद्यालयों के तकरीबन एक दर्जन छात्र पुनः अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय गए। वहां सम्बंधित अधिकारी से मिलने पर पता चला की वर्ष 2016-2017 में 130 करोड़ की डिमांड थी, जिसमें मौजूदा सरकार ने केवल 80 करोड़ ही आवंटित किया था। यह राशि अक्टूबर 2016 में ख़तम हो गयी और आगामी वित्त वर्ष में भी केवल 100 करोड़ मिला है जो डिमांड के मुकाबले काफी कम है।

गौरतलब है कि मौलाना आज़ाद फ़ेलोशिप के अलावा राजीव गांधी फ़ेलोशिप फॉर एससी/एसटी तथा अन्य स्कीम (जो ओबीसी और अन्य के लिए हैं), सही चल रही हैं।

बिना वित्तीय सहायता के छात्रों के लिए रिसर्च कर पाना बेहद कठिन कार्य साबित हो रहा है। अप्रैल 2016 से अब तक नये छात्रों को एक भी पैसा न मिलना मानसिक अवसाद पैदा कर रहा है। पुराने छात्रों को केमिकल और उपकरण खरीदने में समस्या का सामना करना पड़ रहा है। परिणामस्वरुप वे रिसर्च से सम्बंधित कार्य नहीं कर पा रहे हैं।

इन परेशानियों से जूझ रहे छात्रों ने फेसबुक पर ‘यूजीसी – फ़ेलोशिप फोरम’ नाम से एक ग्रुप बनाया है। जिसमें हजारों छात्र शामिल हैं जो लगातार मंत्रालय को अपनी परेशानियों के सम्बन्ध में विभिन्न माध्यमों से लिख रहे हैं। लेकिन मंत्रालय से उचित जवाब न मिल पाने के कारण वे काफी मायूस हैं। मुझे डर है कि यह मायूसी इन छात्रों को रोहित वेमुला बनने के लिए मजबूर न कर दे।

 
मोहम्मद फुरकान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट में सीनियर रिसर्च फेलो हैं। मोहम्मद फुरकान से उनके ईमेल furquan1989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 

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