आईएसआई का मध्य प्रदेश कनेक्शन: खामोश क्यों है मुख्यधारा मीडिया?

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दहशतगर्द
स्केच: worldatlas.com

मुहम्मद ज़ाकिर रियाज़

भारतीय मीडिया की इस खूबी की तारीफ की जानी चाहिए कि जितना विस्तार से और रोज़ाना एक कक्षा की तरह प्राइम टाइम में जितनी जानकारी उन्होंने ‘वैश्विक’ आतंकवाद पर अपने दर्शकों को दी है, शायद उतनी जानकारी दर्शक कभी न जुटा पाते। कोई भी आतंक की घटना होती है उसके फ़ौरन बाद भारतीय मीडिया जांच एजेंसीयों के जांच शुरू करने से पहले ही मीडिया एजेंसी ‘बड़ा खुलासा’ कर देती हैं। इस बड़े खुलासे की स्क्रिप्ट भी बाकायदा हमेशा तैयार रहती है। जिसमें चार-पांच दाढ़ी टोपी वाले मुसलमानों की तसवीरें और ‘इंडियन मुजाहिदीन’ जैसे किसी संगठन के ईमेल का हवाला होता है। बाद में जांच में वह ईमेल चाहे गुजरात में रहने वाले किसी मनु ओझा का ही क्यों न निकले। भारतीय मीडिया की इसी महनत और लगन की बदोलत आज हमें हर दाढ़ी-टोपी वाले शख्स के अन्दर आईएसआईएस का बगदादी नज़र आता है।

लेकिन मीडिया का यह रवैया हर आतंकी घटना के साथ नहीं होता। खासतौर पर उन आतंकी घटनाओं में तो बिलकुल नहीं जिनमें उन्हें कोई मुस्लिम ‘शिकार’ नहीं मिलता। इसलिए हमें समझौता ब्लास्ट केस, मालेगांव मस्जिद ब्लास्ट और ऐसे अन्य मामलों से जुड़ी कोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती। यही वजह है कि भारत में शायद ‘इस्लामिक’ आतंकवाद के अलावा किसी और तरह के आतंकवाद के बारे में नहीं जानते।

मीडिया भले ही यह दोमुहा रवैया अपनाए लेकिन हमें मीडिया से उम्मीद रहती है कि वह हमें ऐसी ‘सभी’ घटनाओं से जुडी जानकारियां मुहैया कराये। इसी उम्मीद की वजह से मैंने आज मध्य प्रदेश में पिछले दिनों गिरफ्तार हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई, जो भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देती है, उसके एजेंटो के बारे में खबरें खोजनी शुरू की। लेकिन कमाल की बात यह है कि मध्य-पूर्व एशिया में सक्रीय आईएसआईएस और उसके जैसे आतंकवादी संगठनों की बाल की खाल निकाल देने वाल भारतीय मुख्यधारा मीडिया, इन एजेंटो के डीएनए का विश्लेषण नहीं कर सका।

इस घटना से जुड़ी जो भी खबरें मुझे मुख्यधारा की वेबसाइट और अख़बारों में मिली वो 9 फ़रवरी से 11 फरवरी के बीच की थी। इन ख़बरों का सतही विश्लेषण भी किया जाए तो उससे यह बाहर आता है कि रिपोर्टरों को इस घटना में किसी मुस्लिम नाम वाले व्यक्ति के शामिल न होने की हैरानी है। इससे भी बड़ी ख़ुशी की बात यह है कि यह मीडिया हाउस जो हर हमले के बाद किसी भी संदिग्ध को मास्टरमाइंड घोषित कर देते हैं वे पहली बार ‘कथित’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए देखे गए। यह अच्छी शुरुआत है लेकिन इसका एक तरफ़ा होना बेहद गलत है।

सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि इन ख़बरों में कहीं भी इस आईएसआई सहायक गिरोह को आतंकवाद से नहीं जोड़ा गया है। जबकि कई ख़बरों ने इस तरफ इशारा किया था कि ये लोग भारतीय सेना से जुडी जानकारियाँ पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी को मुहैया कराते थे और पिछले दिनों सेना के हेडक्वार्टरों पर हुए हमलों में इनकी संलिप्तता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन ऐसा लगता कि भारतीय मीडिया ने इस पर ख़ामोशी का रुख अपना कर इन जैसे आतंकवादियों को मौन समर्थन ज़ाहिर कर दिया है।

इस मामले में जांच एजेंसी द्वारा इन लोगों के खिलाफ आतंकवाद के चार्ज न लगाना और खुद को आतंकवाद के मामलों में विशेषज्ञ कहने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या हमारी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई वाकई में आतंकवाद के खिलाफ है या यह सिर्फ देश के मुसलमानों को हाशिये पर धकेलने का एक हथकंडा है?

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