कभी सोचा नहीं था शादी के बाद ज़िन्दगी ऐसे बदल जाएगी

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    सुमित्रा से बात करती हुई अंजली

    अंजली कुर्रे
    जांजगीर चांपा (छत्तीसगढ़)

    छत्तीसगढ़ के जिला जांजगीर चांपा विकास खंड डभरा ग्राम कंवालाझार की निवासी सुमित्रा जयसवाल का कहना है, “कभी सोचा नही था कि सरकारी नौकरी कर पाउंगी वो भी शादी के बाद” ।

    सुमित्रा बताती है कि “हम चार बहन तीन भाई हैं। परिवार पढ़ा लिखा है। माँ, बाबूजी सिलाई, कढ़ाई का काम करके घर चलाते थे। मैं बारहवीं तक पढ़ी हूँ, बचपन से सोचती थी कि  मैं भी सिलाई, कढ़ाई जैसे काम करके ही ज़िन्दगी गुजारुंगी।

    22 साल की थी जब शादी हुई। ससुराल वाले भी शिक्षित हैं। वो शुरु से चाहते थे कि घर के काम के साथ-साथ और भी कुछ करूँ। खास तौर से सरकारी नौकरी के लिए हमेशा सुसराल वालो ने प्रेरित किया। 2004 में जब मितानिन के पद के लिए आवदेन मांगे जा रहे थें तो सबने आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया। मैने आवेदन डाला और नियुक्त कर ली गई। 6 साल तक इस पद पर काम किया, फिर 2011 में मैं एम. टी (मास्टर ट्रेनर) बनी| अब मितानीन मेरे अंडर में काम करती हैं।

    आपको बता दें कि मितानिन गर्भवती महिलाओं के पंजीयन, जांच, व संस्थागत प्रसव कराने में सहयोग करती हैं। इसके अलावा कुपोषित बच्चों को पोषण पुर्नवास केंद्र भेजने 0-5 साल के बच्चों का टीकाकरण के अलावा स्वास्थ्य विभाग के अन्य काम करती हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से उन्हे वेतन भुगतान नही किया जाता बल्कि प्रोत्साहन राशि दी जाती है।

    अपनी दिनचर्या के बारे सुमित्रा कहती हैं “रोज़ सुबह 5 बजे उठ कर घर के काम में लग जाती हूँ, बच्चों को स्कूल भेजना, टिफिन तैयार करना आदि। 11 बजे से मेरी बाहर की जिम्मेदारियां शुरू होती हैं। गांव-गांव जाती हूँ, बैठक रखती हूँ। बैठक के बारे गांव की महिलाओं को मितानिन पहले से ही सूचना दे देती हैं। मितानिन और गांव वाले एक साथ जमा होते हैं, फिर मितानिन ताली और प्रेरक गीत से कार्यक्रम शुरू करती हैं। VHSNC (ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति) के अंतर्गत चर्चा शुरू होती है। जैसे गांव वालों के स्वास्थ्य से संबधित चर्चा, गांव गली की सफाई, स्कूलों की, आँगन बाड़ी की स्थिति कैसी है? इत्यादि की चर्चा।

    इन सभी कार्यो के लिए हमें कोई निर्धारित मासिक वेतन नही मिलता बल्कि प्रतिदिन के 250 रुपए मिलते हैं। रविवार को छोड़ कर पूरे महिने काम करते हैं और महीने में एक बार B.C.  (ब्लाक कोर्डिनेटर) को रिपोर्ट देनी होती है।

    ससुराल में कितने सदस्य हैं पूछने पर सुमित्रा कहती हैं” कुल 14 सदस्य हैं। तीनो बहुओं में से सिर्फ मुझे दो बेटियां हैं बाकी को दो- दो बेटे हैं। सास ससुर कभी-कभी बोलते है कि मुझे भी एक बेटा हो जाए तो अच्छा होगा। बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर मैं और मेरे पति धनंजय जयसवाल दोनो बेटियों को ही अच्छी शिक्षा देकर आगे बढ़ाना चाहते हैं। पति कहते हैं कि बेटे की चाह में और बेटियां हो गई तो परिवार तो बढ़ेगा ही किसी को अच्छी शिक्षा और ज़िन्दगी नही मिल पाएगी इसलिए दोनो बेटियों को ही काबिल बनाना है।

    बड़ी बेटी प्रीती जयसवाल 14 वर्ष की है और पढ़ लिख कर आईपीएस बनना चाहती है। छोटी बेटी प्रिया जयसवाल 12 वर्ष की होने वाली है वो कलेक्टर बनना चाहती है।

    चाहती हूं मेरी बेटियां मुझ से भी आगे जाएं और ससुराल वालो ने जिस तरह मुझे आगे बढ़ने के लिए सहयोग किया मेरी बेटियों को भी करें।मैं खुद जब सरकारी काम-काज की गतिविधियों को संभालती थी तो पहले मुझे झिझक होती थी| लेकिन सबने विश्वास दिलाया कि मैं ये कर सकती हूं”।

    बहू की सफलता के बारे सास- ससुर कहते हैं “हमारी तीन बहुओं में सुमित्रा समझदार और पढ़ी लिखी है इसलिए हमने उसे आगे बढ़ने से नही रोका। आज वो घर की ज़िम्मेदारी के साथ बाहर का काम भी संभालती है। लोग जब उसकी तारीफ करते हैं तो गर्व होता है। हमारी कोई बेटी नही जो ये सपना पूरा करती पर सुमित्रा के कारण ऐसा संभव हो पाया है। वो जिस लगन से काम करती है उसे देखकर पता चलता है कि बेटियों को यदि सहयोग दिया जाए तो हमेशा हमारा सिर उंचा करती हैं। अब हमारी दोनो पोतियां भी सुमित्रा की तरह बने तो खानदान का नाम और आगे जाएगा। सुमित्रा को देखकर विश्वास हो गया है कि सिर्फ बेटा या पोता ही खानदान का नाम रोशन नही करता बेटी, बहुएं और पोतियां भी कर सकती हैं”।

    पति धनंजय जयसवाल के अनुसार “ हमारे भरे पूरे परिवार में मेरी पत्नी एक उदाहरण है इस बात पर मुझे गर्व है। शुरुआत में बाहर निकल कर काम करने में वो काफी संकोच करती थी पर हमें विश्वास था एक दिन सब संभाल लेगी। नारी में बहुत क्षमता होती है पर ससुराल वाले उसे सहयोग न करें तो वो आगे बढ़ने की हिम्मत कैसे कर पाएगी”।

    सुमित्रा की देवरानी और जेठानी ने अफसोस जताते हुए कहा “सुमित्रा को देख कर अहसास हुआ कि शिक्षित होना कितना महत्वपूर्ण है। हमारे मां- बाप भी हमारी शिक्षा पर ध्यान देते तो आज कुछ कर दिखाते। पूरे गांव में सुमित्रा की तारीफ होती है। गर्व है वो हमारे घर का हिस्सा है। बच्चे भी उसी की तरह मेहनती बने, हम यही चाहते हैं”।

    ससुराल वालों की प्रतिक्रिया सुनकर सुमित्रा खुश नज़र आ रही थी। चेहरे पर चमक लिए कहने लगी मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसा सुसराल मिला। आजकल सुसराल में लड़कियों को प्रताड़ित करने और जलाने वाले परिवार तो बहुत मिल जाते हैं पर इस तरह सहयोग करने वाला ससुराल बहुत कम है। मैं हर सास- सुसर से विनती करती हूं कि वो बहू को बेटी समझ कर उसे प्यार और सहारा दें तो बहू भी आजीवन आपके सम्मान की रक्षा करेगी। क्या पता कल को वही आपके बुढ़ापे का सहारा बने।

     

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