उर्दू और अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: भेदभाव सहती एक भाषा

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उर्दू
तस्वीर: wikipedia.com

फिरोज आलम, बिहार

प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य है भाषाओं और भाषाई विविधता को बढ़ावा देना। विविधता में एकता की विशेषता रखने वाले हमारे देश में भाषाई विविधता भी पाई जाती है जिसमें उर्दू अपना खास स्थान रखती है।

इस संबध में बात अगर राज्य बिहार की करें तो हर जगह की तरह बिहार राज्य में भी सभी स्कूलों में इस दिन भाषण, वाद-विवाद, गायन, निंबध लेखन इत्यादि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। बच्चों को भाषा की महत्वपूर्णता और विविधता को समझानें का ये एक अच्छा प्रयास है। हालंकि इतने प्रयासों के बाद भी न सिर्फ बिहार से बल्कि देश से उर्दू धीरे धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है।

आज देश के सरकारी स्कूलों में उर्दू की शिक्षा न के बराबर दी जा रही है। बिहार राज्य के जिला सीतामढ़ी के पुपरी प्रखंड में ऐसा एक भी स्कूल नही जहां बच्चों को उर्दू की शिक्षा मिले।

इस बारे में पुपरी के मोहम्मद महफुज कहते हैं, ‘यहां के 20 फीसदी बच्चे उर्दू तालीम से दूर हैं। दस फीसदी को उर्दू में खत लिखना और दसतख्त करना भी नही आता। साथ ही बच्चे में उर्दू सीखने का शौक भी खत्म होता जा रहा है’।

मौहम्मद हामिद के मुताबिक, ‘यहां एक भी उर्दू लाइबरेरी नही है। जहां से बच्चों को उर्दू किताब मिल सके। दो प्राइवेट स्कूल है जहां कुछ बच्चे तालीम हासिल करते हैं। ऐसे में जिन बच्चों को उर्दू सीखने का शौक है वो शहर में जाकर अपना शौक पूरा करते हैं’।

दारुल उलूम देवबंद के छात्र मुजिबूल हक जिया जो मूल रुप से बिहार के मोतिहारी के निवासी हैं, उर्दू के साथ अपने भविष्य को किस तरह देखते हैं पूछने पर बतातें हैं, ‘मैं उर्दू से स्नातक पास करके यूपीएससी की तैयारी करना चाहता हूँ। उर्दू भाषा से यूपीएससी की तैयारी करने वालों की तादाद यूं तो बहुत कम है। लेकिन जो करते हैं उन्हे इस जुबान पर यकीनन भरोसा होना चाहिए। हां ये भी सच है उर्दू के मुकाबले ज्यादातर दुसरी भाषा को कामयाबी मिलती है’।

दिल्ली स्थित गैर सरकारी संस्था चरखा डेवलंपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क के डिप्टी एडीटर मोहम्मद अनिस उर रहमान खान अपने अनुभव को साझा करते हुए कहते हैं, ‘इसमें कोई शक नही कि उर्दू हमारे देश की भाषा है, इसे मुगलों या किसी दूसरे मुसलमान राजा के कार्यकाल में बढ़ावा नही मिला बल्कि यह सार्वजनिक भाषा बनकर खुद अपनी क्षमता से लोगों के दिलों पर कब्जा करती चली गई। इस भाषा ने अंग्रेजों को इतना प्रभावित किया कि  विदेशी अंग्रेजों को उर्दू पढ़ाने के लिए कोलकाता में 4 मई 1800 इसवीं में फोर्ट विलियम कॉलेज की बुनियाद रखी गयी। अंग्रेज शासकों के अलावा ईसाई धार्मिक नेताओं ने भी अपने विचार लोगो तक पहुंचाने के लिए उर्दू का प्रयोग किया। बाद में प्रेमचंद जैसे लेखकों ने ग्रामीण भारत के दर्द को इसी भाषा द्वारा लोगो के बीच पहुंचाया। देश की आजादी के समय इंक़लाब ज़िन्दाबाद जैसा शक्तिशाली नारा उर्दू भाषा की देन है। परन्तु जिस भाषा ने देश की आजादी में अपनी महत्वपूर्ण भुमिका निभाई आज उसी भाषा के साथ भेदभाव हो रहा है। आप देखिये फिल्म इंडस्ट्री में उर्दू का कब्जा है, लाखों, संवाद, गीत सब उर्दू में ही होते हैं। इसके बावजुद कई लोग उर्दू को पाकिस्तानी भाषा समझते है। जो हमारे लिए दुख की बात है’।

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और चरखा के लेखक शैलन्द्र सिंहा उर्दू को लेकर काफी गर्व महसूस करते हैं, वे कहते हैं, ‘उर्दू सच में मीठी जुबान है औऱ इसकी मिठास का अंदाजा मुझे हर बार तब होता है जब चरखा के सहयोग से मेरे हिंदी लेख अनुवाद होकर उर्दू के अखबारों में छपते हैं। और लोग उसे पढ़कर लेख की तारीफ करते हैं। अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। तब अफसोस होता है कि काश मैं भी इसे सीख पाउं ताकि अपने लेख को उर्दू अखबारों में मात्र एक चित्र के समान न देखूं बल्कि उसे पढ़ सकूं’।

बिहार के जे-एल-एन-एम कॉलेज, सुरसंड के उर्दू प्रोफेसर अब्दुल मन्नान कहते हैं ‘फारसी की ही तरह आज उर्दू भी हमारे बीच से कहीं गायब सी होती जा रही है। जिसका सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ीयों को होगा अगर हमने समय रहते इस जुबान को सुरक्षित नही किया तो बड़ी देर हो जाएगी’।

अफसोस की बात है कि जिस भाषा को हम मीठी जुबान के नाम से जानते हैं हम सबकी लापरवाही के कारण आज इस जुबान की मिठास लोगो को इतनी फीकी लगने लगी है कि लोग जाने अनजाने इसके बहुत से शब्दो कों बोलते तो हैं पर इसे पूरी तरह अपनाने से न जाने क्यों कतराते हैं। आइए हम सब मिलकर इस जुबान को सुरक्षित करने का प्रण लें। जितनी उत्सुकता और लगन से हम अंग्रजी भाषा को सीखते हैं उसी प्रकार उर्दू के लिए निंरतर प्रयास करें। ताकि उर्दू को जीवित रख हम खुद को जीवित रख सकें। (चरखा फीचर्स)

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